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दो मित्रों की कहानी

कहानीकार-सुधीर कुमार जाटव
सोशल मीडिया में बेहद अहमक भूमिका निभाने वाले सुधीर दकियानूसी कर्मकांडो व अन्धश्रद्धा पर अपनी लेखनी से जोरदार प्रहार करते है। बुलन्दशहर में रहने वाले सुधीर की लेखनी में तेज धार का असर इतना गहरा व सकारात्मक है कि एक बड़ी सख्या में उनके आलेख पढ़े जाते है।
डेस्क। राम और श्याम दो मित्र थे। श्याम जहाँ पढ़ने लिखने में होशियार और परिश्रमी था वहीं राम आलसी और खुराफाती था। दोनों की प्रकृति अलग अलग थी लेकिन मित्रता गहरी थी। श्याम कई बार राम को मित्रता का हवाला दे समझानें की नाकाम कोशिश कर चुका था। पर नतीजा हर बार की तरह उसे शून्य ही मिला। शिक्षा में राम की हालत बेहद दयनीय रहती। वह किसी तरह गिर पड़कर जहाँ पास होता था तो वहीँ श्याम कक्षा टॉप करता था।
खैर दोनों ने पढ़ाई समाप्त कर अपने अपने रोजगार की ओर अग्रसर हो गए। श्याम ने विभिन्न दफ्तरों में हॉथ पावॅ मारा। मैधावी था, जिससे उसकी जल्द ही नौकरी लग गई। लेकिन राम के पास इतनी बुद्धि कहॉ थी। वे सदैव अपने साथियों के बीच तिकड़मबाजी के बलबूते ही पास होता आया था। उसे इस बात की कोई फिक्र नहीं थी कि उसका गुजारा कैसे हो? हो भी कैसे अब वह लोंगों को ठगने व गलत तौर तरीकों से पैसे ऐंठने में लग गया था। उसकी गलत आदतों के चलते संगति भी बुरी हो चली थी।
इसी बीच श्याम कहीं से निकला तो राम को सड़क पर टहलते देखा तो वह रुक कर उसके पास गया। श्याम ने राम से नमस्कार करते हुए कुशलक्षेम पूंछी तो उसे पता चला कि राम अभी भी कुछ नही कर रहा है। जिस पर श्याम ने कहा भाई अब तू भी कुछ काम देख ले। ऐसा कब तक घूमता रहेगा। राम ने मुस्कराते हुए कहा मुझको काम करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझको पैसे देने के लिए तेरे जैसे बहुत से बंधु हैं। श्याम चौंक उठा। मैं तुझको खॉमखा में पैसा क्यों दूंगा? मैं तुझको पैसे कभी नहीं देने वाला। और तुझ जैसे निठल्ले को तो हरगिज भी। राम ने कहा-भाई देख लेना तू अपनी मर्जी से देगा। और उन पैसों को वापिस भी नही मांगेगा।
बात आई गयी हो गई। जिस रास्ते से श्याम अपनी नौकरी जाता था। उसी रास्ते के किनारे एक जगह पर राम ने त्रिभुजाकार पाँच ईंट थोड़ा सा सिंदूर लगाकर और एक चुनरी ओढ़ाकर रख दी। उनसे ऊपर लिख दिया जय माता उमईया देवी। पहले दिन तो किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। जिस पर राम ने एक पैकेट डालडा ले आरती दान में दीप जला दिया। फिर अपने यार दोस्त के यहॉ से घंटी उधार मांग लाया। अपने आपको पूरी तरह से तिलक आदि लगा कर वहॉ पालथी बैठ गया ओर लगा घंटी बजाने।
उसे घंटी बजाता देख एक रास्ता जाते हुए व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी तो बोला जय माता उमईया देवी।
वह आदमी किसी नौकरी को लेकर साक्षात्कार देने जा रहा था। उसने शुभ अशुभ सोंच अपनी जेब से पर्स निकाली और एक नोट राम की ओर बढ़ा दी, राम ने उसे खुब बढ़िया उसके मन को खुश कर देने वाला आशिर्वाद दिया। कुछ ही देर में किसी महिला की नजर पड़ी तो उसने भी नमन किया, फिर उसने माता के बारे में जानकारी करनी चाही। तो राम ने कई कहानियों के संगम के तौर पर उसे भी सुना दिया। महिला प्रभावित हो सौ रुपये का चढ़ावा चढ़ा आगे बढ़ चली। लौटते हुए श्याम ने देखा कि सड़क के पास बड़ी भीड़ लगी हुई है। तो उसने मामला देखना चाहा। लेकिन भीड़ में उसे कुछ समझ न आया। बाहर भीड़ से अलग खड़े लोगों से उसने जानकारी की, तो उसे पता चला कि यहॉ पर एक सिद्ध मैया उमईया देवी का उद्गम हुआ है। बेहद सिद्धदात्री है। इतना शिक्षित होने के बाद भी श्याम उनकी बातों से प्रभावित हुए बिना रह नही सका। उसने भी बिना भीड़ से घिरे आदमी को पहचानें बैगेर 50 रुपये की एक नोट राम की ओर फेक दी। फिर जब भीड़ छटी तो राम के पास नोटों- सिक्कों का ढेर लगा था। उसने सारे चढ़ावे को उठाकर गिना तो पहले दिन की रकम करीब 3000 रुपये निकली। उसने यह दिनचर्या अपना ली। थोड़ा बहुत खर्च कर उसे बेहद अच्छा मुनाफा मिलने लगा था। उसे दिन भर कोई दस कोई पचास कोई सौ रुपये का चढ़ावा चढ़ाता रहता। उसे केवल दिन भर उन ईंटों की निगरानी करता और शाम को चढ़ावा इकट्ठा कर चलता बनता । बैठे बिठाए उसको अच्छी खासी आमदनी होने लगी । जब उसके पास अच्छी रकम जमा हो गयी। उसने स्थानीय नेता को अपने भक्तों के जरिए दबाव आदि से बुलवा कर उसकी ही निधि से वहीं पर एक मंदिर का निर्माण करा लिया। और स्वंय उसका प्रबंधक बनकर बैठ गया। अब तो खुद के लिए भी आराम मिले इसके लिए एक सहायक के तौर पर एक पुजारी पाँच हजार रुपये महीने की नौकरी पर रख लिया। अब उसकी महीने की आमदनी लाखो रुपयों में हो गयी थी। चंदा तो मिलता ही था। वहॉ के स्थानीय नेतागण भी निधि वैगेरह उसके हवाले कर जाते थे। इसी बीच श्याम उधर से निकला। वह उधर से काफी समय बाद निकला था। उसने राम को देख उससे मिलने आगे बढ़ा। राम ने खुद हाथ बढ़ा उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। दोनों मंदिर के प्रांगण में बने चबूतरे में जा बैठे। काफी दिन बाद दोनों मित्र एक साथ बैठे थे। श्याम राम के ठाट बाट देखकर हैरान था। श्याम ने राम से पूछा भाई तुम तो लगता है काफी अमीर हो गए हो। नई गाड़ी बंगले आखिर तुमने इतनी रकम कहाँ से जमा की ? तुमने कोई व्यापार कर लिया है क्या ?
राम ने कहा हाँ भाई मैंने व्यापार कर लिया है।
श्याम ने कहा लेकिन व्यापार करने के लिए तुम्हारे पास पैसा कहाँ से आया ? तुम्हारे पास तो पैसा भी नही था । आखिर तुमने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली ? कहीं तुमने कोई लूट डकैती तो नही की ?
राम ने कहा मैंने कोई लूट डकैती नही की। मैंने व्यापार किया है आस्था का व्यापार। मैं आस्था बेचता हूँ। जिसको तुम खरीदते हो। तुम्हारे जैसे और खरीदते हैं। मैंने तुमसे कहा था ना कि मुझको पैसा तुम दोगे। मुझको पैसा तुम देते हो।
श्याम ने हैरान परेशान होते हुए मैं समझ नही पाया। राम ने कहा तुम जिस रास्ते से अपनी नौकरी जाते थे। उस रास्ते में एक माता का मंदिर है जिसमे तुम जब से दक्षिणा देते हो जब वहाँ सिर्फ ईंटे रखी थी । वो मंदिर मेरा है । मैं उस मंदिर का मालिक हूँ । तुम आज कितना कमाते हो ? चालीस हजार पचास हजार ? मैं हर महीने लाखों कमाता हूँ लाखों। श्याम ने कहा भाई तुम महान हो। मैं पढ़ने लिखने में लगा रहा और तुमने दुनिया को समझ लिया।
इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिलती है?

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