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सपा-बसपा के गठजोड़ के पीछे क्या है असली वजह.......

फ़ाइल छायाचित्र
डेस्क। सपा-बसपा के गठजोड़ ने कांग्रेस से लेकर भाजपाईयों की नींद उड़ा दी है। जहॉ प्रमुख दल इस मेल को लेकर न जाने क्या क्या कहते फिर रहे है। वहीं दोंनों कों धुरविरोधी पार्टियां साबित कर देने में भी जुट चुके है। कई अखबार नवीस तो इसे राजनीति अवसरों का खेल बताने से भी नहीं चूके रहें है। आज प्रदेश की सियासत में सब कुछ बदल चुका है। मीडिया द्वारा बार बार उछाला जा रहा 23 साल पहले हुआ हादसा अब इतिहास की गर्त में समा चुका है। आज लखनऊ में दों प्रदेश की प्रमुख दलों की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक तस्वीर बना रही है। जिसमें सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती है।
 
पहले भी कभी थे साथ और आज फिर से
सूबे में जब 1990 के शुरुआती दौर में उत्तर प्रदेश में मंदिर-मस्जिद विवाद के कारण ध्रुवीकरण अपने चरम पर उफना रहा था। और यह बात सभी राजनैतिक दल अच्छी तरह से समझ चुके थे। जिसके बाद 1993 का चुनाव, जिसमें मीडिया द्वारा घोषित दो धुरविरोधी प्रदेश की प्रमुख पार्टियां सपा और बसपा ने साथ चुनाव लड़ने का फैसला लिया। इस फैसले ने पूरे प्रदेश की राजनीति को ही बदल कर रख दिया।
इस चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इसके बाद गठबंधन ने 4 दिसंबर 1993 को सत्ता की कमान संभाल ली। जिसमें पहला कार्यभार मुलायम सिंह ने संभाला। उससे पहले भी धरती पुत्र मुलायम सिंह ने जनता दल की ओर से विजयी हो कर 1989 में प्रदेश की सत्ता संभाली थी। वे 201 दिन ही सूबे के मुख्यमंत्री बने रह सके थे। उनका टर्म एक साल 181 दिन का चला। जिसके बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली। यह विकल्प जनता में भी खुब फबा। लेकिन समय का फेर कहें या फिर कुछ और कि यह गठबंधन 2 जून, 1995 को मायावती के 137 दिनों का अल्प शासन के साथ ही धरासाई हो गया।
 प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग चुका था। लेकिन तब तक मायवती जन जन के मन में स्थापित हो चुकी थी। यही वजह थी कि 1995 में मायावती  पुनः सत्ता संभालनें में कामयाब रही। उनका यह कार्यकाल बहुत अधिक नहीं रहा। कुल 137दिन ही वे सत्ता में काबिज रह पाई। लेकिन इतना कम समय भी उनके कार्यप्रणाली के लिहाज से प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने में कामयाब रहा। वर्ष 1997 में राष्ट्रपति शासन के दौरान हुए चुनाव के बाद किसी को भी पुनः बहुमत नही मिल सका। जिसके बाद भाजपा के साथ मिल मायावती ने प्रदेश में सरकार बनाई। उनका कार्यकाल एक साल 184 दिन प्रदेश में चल सका। जिसके बाद प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन समाप्त हो जाने के बाद सपा ने अपनी सरकार बना ली।  प्रदेश में 2002 में चुनाव में मायावती के हाथ प्रदेश की बागडोर आ गई। यह सत्ता कुल एक वर्ष 118 दिन ही चल सकी। 2003 में हुए चुनाव के बाद मुलायम सिंह पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में काबिज हो गए। मुलायम सिंह ने कुल 3वर्ष 257 दिन शासन किया। अब जनता द्वारा अल्पमत देने का काल समाप्त हो चुका था। यह भी कह सकते हैं कि जनता अल्पमत वाली सरकार से ऊब चुकी थी। वर्ष  2007 में मायावती को भी जनता ने पूर्ण बहुमत से प्रदेश की सत्ता सौंपी। इसके बाद सरकारों की ने अपना पूर्ण कार्यकाल किया।  जिसके बाद पुनः सपा को 2012 में सत्ता मिल गई। सपा बसपा के मध्य जनता ने इस बार 2017 में भाजपा को चुना। 
विशेष रिपोर्ट- आलोक अवस्थी