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पूंजीपतियों के प्रति उदार सरकारे आखिर क्यों देना चाहती है सार्वजनिक उपक्रमों की बलि

डेस्क। देश के पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के पीछे आखिर कौन सी ताकते काम करती है। यह सब कैसे संभव है। इसी तरह के कई सवाल आपके दिमाग में चल रहे होंगे। आइए सारी बाते स्पष्ट करते चलते हैं। इसके पीछे एक बहुत बड़े स्तर की प्रणाली काम करती है। जिसमें प्रमुख रूप से सत्ता पक्ष की प्रणाली प्रभावी रहती है।
नाजायज लाभ पहुंचाने का सबसे बड़ा हिस्सा सरकार का होता है। सरकार द्वारा छोटा-सा फैसला ले लेने से कैसे अरबों का लाभ पूंजीपति को मिल सकता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश के सबसे बड़े पूंजीपति परिवार के उदय में देखा जा सकता है। हमने बचपन में उद्योगपतियों में टाटा, बिड़ला, सिंहानिया, डालमिया, गोदरेज आदि के नाम सुने थे। राजीव गांधी की कपड़ा नीति के दो बड़े परिणाम निकले। खेती के बाद के सबसे बड़े रोजगार हैण्डलूम का नाश और अम्बानी का उदय। स्पर्धा से बचाना और बड़ा बाजार मुहैया करा देना सरकार का बांए हाथ का खेल है। सिर्फ अम्बानी समूह सिंथेटिक धागा बनाएगा (जो तब तक आयात होता था)। कोई राज्य सरकार फैसला कर ले कि हर थाने में मारुती की जिप्सी ही ली जाएगी तो उस कम्पनी को बना बनाया बाजार मिल गया। अरबों के बिजली माफ करना ,आम जनता से दस-बीस गुना सस्ती बिजली देना भी ऐसे उपाय है।
बहरहाल,सार्वजनिक क्षेत्र के भीतर भी भ्रष्टाचार है जिसका प्रमाण निजी क्षेत्र को दिए गए लाभों की तुलना में बहुत कम है।६० के दशक में लोहिया सार्वजनिक क्षेत्र पर सवाल उठाते थे- सर्किट हाउस में इतना कम किराया लगता है उनमें किसान क्यों न रहें? सार्वजनिक कम्पनियों के अधिकारी वाहनों का दुरुपयोग करते हैं। २० किमी गाड़ी दौड़ा कर अपनी पसंद की ब्राण्ड की सिगरेट मंगवाने जैसी बरबादी इस देश की राजनीति की ही देन है। लोहिया जब ऐसे सवाल उठाते तब नेहरू और उनके पिछलग्गू कम्युनिस्ट कहते कहते कि यह सार्वजनिक क्षेत्र पर सवाल उठा रहा है यानि निजी क्षेत्र का समर्थक है, सी.आई.ए एजेन्ट है। कोयला ब्लाक आवण्टन,स्पेक्ट्रम आवण्टन घोटाले में किन्हें निजीकरण का नाजायज लाभ मिला है? जिन्दल जैसों को,टेलिकॉम कम्पनियों को। जनलोकपाल निजी क्षेत्र और स्वयंसेवी संस्थाओं पर नहीं लागू होगा- अन्ना हजारे या केजरीवाल उनपर यह अथवा सूचना कानून लगाने के पक्ष में नहीं ।
अधिकांश राजस्व अप्रत्यक्ष करों से मिलता है यानि आम आदमी से। सरकार की जिम्मेदारी है राजस्व का खर्च जनता की सेवा के लिए करे। सरकार का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, न कि अपने स्वार्थपूर्ति के लिए कम्पनियों का पिछलग्गू बनना महत्वपूर्ण हो।  कंपनियों का शिर्फ मकसद मुनाफा कमाना होता है, कैसे भी। आम आदमी से एकत्र राजस्व से जो शिक्षा,स्वास्थ्य आदि सेवा मिलती थी उनका तेजी से निजीकरण होना जनता पर दोहरी मार हुई। मुनाफा कमाने वाले यह सेवा मंहगा कर देते हैं ,उन्हें गरीब से मिला टैक्स भी लाभ मे मिलता है। हमारे विश्वविद्यालय परिसर के बगल में निजी अस्पताल है। एक सरकारी एजेन्सी से उसे कई बरस पहले २० करोड़ मिले थे। आम आदमी उसमें इलाज नहीं करा सकता।
इसी क्रम में अमरीका से लेकर भारत में पूंजीपतियों को दिए जाने वाले कर्जों यानी कर्ज माफी का हाल इस बात को और अच्छी तरह से पुष्टि कर देता है, क्योंकि वित्तीय पूंजी के बोलबाले वाले युग में हम रह रहे हैं। लोहिया जी के अर्थशास्त्र को ज्यादा नहीं जानता, लेकिन अगर कम्युनिस्ट पब्लिक सेक्टर का समर्थन करते थे तो ठीक ही करते थे, बस पब्लिक सेक्टर के बारे में उनकी समझ रुसी माडल पर आधारित थी, और इसलिए गलत थी, क्योंकि वह माडल उत्पादकों के हाथ में नियंत्रण सौंपने के बजाय राज्य नियंत्रण के नाम पर वैसा ही शोषण करता था, जैसा हम पूंजीवाद में देखते हैं। 
विचारक:अफलातून द्वारा। 
सकंलन: मयंक आलोक

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