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लोकतंत्र पर गहरी चोट, ग्रामीण अपने हक की लड़ाई भी नहीं चाहता लड़ना


पुरवा/उन्नाव। जमींदारी व्यवस्था समाप्त हुए कई दशक बीत जाने के बाद भी आम आदमी दहशत में जी रहा है। भयमुक्त वातावरण दे पाने में शासन व प्रशासन आज भी विफल है। ऐसे में क्षेत्रीय नागरिक अपने अधिकारों के प्रति उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं। 
प्राप्त जानकारी के अनुसार हिलौली विकास खण्ड की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत गुलरिहा का जब मीडिया के लोगों ने निरीक्षण कर भौतिक हकीकत जाननी चाही, तो इस दौरान ऐसे कई मुद्दे मिले, जिनसे शासन व प्रशासन की मंशा पर प्रश्न चिन्ह लगाए जा सकते हैं। माननीय मुख्यमंत्री द्वारा त्योहार के मद्देनजर 24 घण्टे बिजली दिए जाने आदेश के बावजूद दीपावली के दिन बिजली आपूर्ति नहीं मिली। ग्रामीणों को अंधेरे में ही प्रकाश पर्व दीपावली मनाना पड़ा। इस गांव में खबर लिखे जाने तक शौचालय निर्माण अधूरा था। साथ ही शौचालय निर्माण में धांधली व भ्रष्टाचार की बू आ रही है। जब मीडिया टीम ने ग्रामीणों से जानकारी चाही तो उनमें से कई ग्रामीणों  ने कैमरे के सामने मुंह खोलने से साफ इनकार कर दिया। जबकि बिना कैमरे के गम्भीर आरोप लगाते रहे। ग्रामवासियो ने शौचालय निर्माण में 10-1 का मसाला प्रयोग किये जाने का आरोप लगाया। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि कुछ शौचालय तो बिना गड्ढे के ही तैयार हो गए। कुछ ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि शौचालय निर्माण में स्थानीय ठेकेदार ने रुपये भी मांगें है। शौचालय के लाभार्थियों ने बताया कि उन्हीं से गड्ढे भी खुदवाए गए हैं। 
इस ग्राम पंचायत में लगभग कुल दस हजार वोटर है और 32 मजरे भी है। ग्राम प्रधान भी लगभग चार दशकों से एक ही परिवार से बन रहा है। ग्रामीणों ने दबी जुबान से बताया कि ग्राम प्रधान दबंग किस्म का व्यक्ति है। शायद इसीलिए कोई भी ग्रामीण कैमरे के सामने मुंह खोलने को तैयार नहीं हुआ। लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक और क्या होगा? यहां कराए गए विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार नजर आ रहा है। आजादी के सात दशक बाद भी गांव की सड़कें दुरुस्त नहीं है। मजरा बहुतिया में तो पुराने समय वाला खड़ंजा लगा है और नालियाँ बजबजा रही है। सफाई व्यवस्था भी दुरुस्त नहीं है। आखिर इन असहाय, वंचित व शोषित ग्रामीणों का भाग्योदय कब होगा?
...रिपोर्ट - रत्नम चौरसिया। (एडवोकेट)