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साल 2013 से नहीं ले रहे सबक, नदी-नालों में डम्प हो रहा मलबा

डेस्क। उत्तराखंड में 2013 में होने वाली त्रासदी अचानक होने वाली त्रासदी भर नही थी। उसका कारण हमारे द्वारा लगातार प्रकृति से हमारी छेड़छाड़ है। बरसाती नालों पर अतिक्रमण और नदियों में निर्माण कार्यों के डाले जाते रहे मलबे के ढेरों ने हमेशा से स्थितियों को विस्फोटक बनाया है। जिसके चलते समय-समय पर भीषण दुर्घटनाएं होती रही हैं. 2013 की आपदा की विभिषिका को बढ़ाने या इससे पहले कई घटनाओं ने इसे पुष्ट भी किया है। इसके बाद भी लगातार बरसाती नालों, गदेरों के मुहानों को बाधित करने और नदियों के तल को मलबों के ढेर से उथला करने का ये सिलसिला भविष्य में नयी आपदा को न्योता दे सकता है। 
चारधाम सड़क निर्माण योजना के तहत किये जा रहे निर्माणकार्य इसके उदाहरण हैं।
2013 में अलकनन्दा और मंदाकिनी घाटियों में नदियों के किनारे डम्प किये गए जलविद्युत परियोजना और सड़क निर्माण के मलबे ने व्यापक तबाही मचाई थी। जिसे शायद ही कोई भुला सके। आज भी 2013 और उससे पहले हुई घटनाओं से कोई सबक नहीं लिये हैं। दरअसल चारधाम योजना के तहत ऋषिकेश से श्रीनगर के मध्य और अन्य स्थानों पर हाईवे चौड़ीकरण के दौरान निकल रहे मलबे के अंबार से बरसाती नालों, गदेरों और नदियों को पाटा जा रहा है. जो भविष्य में कभी भी कहर बरपा सकता है।
चारधाम योजना के दोरान पहाड़ की कटिंग और सड़क चौड़ीकरण के दौरान निकल रहे मलबे के लिए वैसे तो लोनिवि राजमार्ग खंड ने डम्पिंग जोन बनाये हैं, लेकिन भूगर्भशास्त्री उन्हें उपयुक्त नहीं मानते हैं। खास बात यह है कि बनाये गए डम्पिंग जोनों के अतिरिक्त भी कई स्थानों पर डाले जा रहे सड़क निर्माण का मलबा सीधे न केवल नदी में जाकर उसके तल को उथला कर रहा है, बल्कि मैदानी क्षेत्रों के लिए भविष्य में किसी बड़ी मुसीबत का कारण होगा। इस मामले में विभागीय अधिकारियों से जब पूछा गया, तो उनका जवाब स्थिति की गंभीरता को कम आंकने जैसा लग रहा है। वे अभी भी जानबूझ कर गलतियों में जी रहे है। 
बेहद बड़ी त्रासदी बन कर आए 2013 की घटना ने जहॉ सबको हिला दिया था। वहीं यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि आखिर कहॉ हमसे गलती हुई। आखि़र उत्तराखंड में इतनी सारी बस्तियाँ, पुल और सड़कें देखते ही देखते क्यों उफनती हुई नदियों और टूटते हुए पहाड़ों के वेग में बह गईं? जिस क्षेत्र में भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाएँ होती रही हैं, वहाँ इस बार इतनी भीषण तबाही क्यों हुई?
उत्तराखंड की त्रासद घटनाएँ मूलतः प्राकृतिक थीं। अति-वृष्टि, भूस्खलन और बाढ़ का होना प्राकृतिक है. लेकिन इनसे होने वाला जान-माल का नुकसान मानव-निर्मित हैं। अंधाधुंध निर्माण की अनुमति देने के लिए सरकार ज़िम्मेदार है। वो अपनी आलोचना करने वाले विशेषज्ञों की बात नहीं सुनती। यहाँ तक कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की भी अच्छी-अच्छी राय पर सरकार अमल नहीं कर रही है। वैज्ञानिक नज़रिए से समझने की कोशिश करें तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस बार नदियाँ इतनी कुपित क्यों हुईं।

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