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राहुल की झप्पी में उलझे पीएम मोदी

आलोक 
यह लेखक के अपने विचार है।
डेस्क। 2019 के चुनावी इंडिया कप का पहला मैच शुक्रवार 20 जुलाई 2018 को संसद की पिच पर खेला गया। इसका नतीजा जो आया उसने कईयो को हिला कर रख दिया। कईयों को शायद यकीन भी नहीं हो रहा होगा कि राहुल क्या ऐसा भी वाकया कर देंगे? अधिंकाश का मानना है कि ये ड्रॉ रहा और इसने अगले साल मई में होने वाले पेनल्टी शूटआउट की जमीन तैयार कर दी है।
राहुल गांधी ने एक कमजोर समझी जा रही टीम के मुख्य स्ट्राइकर के तौर पर विरोधी टीम के मिडफील्ड को तेजी से पार करके उसके डिफेंस में सेंध लगा दी। हालांकि दिसंबर 2017 में हुए गुजरात चुनाव के समय से ही वो लगातार अपनी बढ़ती राजनीतिक परिपक्वता का सबूत देते आ रहे हैं, लेकिन अब उन्होंने अपने तरकश में वो तीर भी जोड़ लिया है, जो अब तक उसमें मौजूद नहीं था। अब उनके तरकश का ये नया तीर आ गया है, वह है  राजनीति के मंच पर छा जाने और पूरी चर्चा पर हावी हो जाने की क्षमता।
उनकी इस झप्पी से  “मास्टर” भौंचक रह गए. वो अपने सिंहासन पर बिना हिले-डुले, अचकचाए से बैठे रहे, तो वहीं राहुल गांधी सुर्खियों में छा गए। आज पक्ष-विपक्ष दोनो ही उनका नाम ले रहा है। राहुल ने अपनी इस अनोखी पहल से शुरुआती बढ़त हासिल कर ली
मुख्यधारा के जिस मीडिया को लंबे अरसे से मोदी को दूसरों के मुकाबले 90-10 की बढ़त देने की आदत पड़ी हुई है, लेकिन इस घटना के बाद वो भी आधी जगह राहुल गांधी को देने पर मजबूर हो गया। किसी भी भरोसे लायक अखबार को उठाकर देख लीजिए, राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े या कई बार तो उनसे ज्यादा तवज्जो पाते नजर आ जाएंगे। 2014 से अब तक बिना किसी खास चुनौती के एकतरफा मैदान मारते आए कैंपेनर पर ये शुरुआती बढ़त राजनीतिक प्रतीकों के गैर-पारंपरिक इस्तेमाल का नतीजा है।
क्या ये राहुल का 21वीं सदी वाला “बेलछी मोमेंट“ हो सकता है, जिसमें मुकाबला ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की जगह सोशल मीडिया पर खेला जा रहा है? और क्या राहुल को ये गुर अपनी दादी की बेमिसाल पॉलिटिकल इंस्टिंक्ट यानी राजनीतिक सहज-वृत्ति से विरासत में मिला है?
साफ दिख रहा है कि राहुल गांधी ने सरकार को बौखला दिया है. उनकी प्रतिक्रियाओं में हास्य-विनोद का पूरी तरह अभाव दिख रहा है. गृह मंत्री ने राहुल की झप्पी की तुलना जंगलों को बचाने के लिए हुए ऐतिहासिक चिपको आंदोलन से कर दी।
मुझे भरोसा था कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी बारी आने पर वाजपेयी की तरह खेलेंगे और राहुल की यॉर्कर को बड़ी आसानी से डीप फाइन लेग की तरफ मोड़ देंगे। इसके बाद वो मोहक मुस्कान बिखेरते हुए गैलरी की तरफ हाथ हिलाएंगे। (मैं फुटबॉल और क्रिकेट की शब्दावली का घालमेल कर रहा हूं, लेकिन कोई बात नहीं, जंग और राजनीति में सबकुछ जायज है.) वो बड़ी आसानी से कुछ ऐसी बात कह सकते थे - “अभी तक तो मैंने केवल उनके बारे में सुना ही था, पर आज मुन्नाभाई से यहां मुलाकात हो ही गई। अरे भाई, जादू की झप्पी तो ठीक है, लेकिन जरा पढ़-लिखकर राजनीति की डिग्री तो पहले पास कर लो।“
लेकिन ऐसा करने की बजाय मोदी ने सरेआम मजाक उड़ाने वाले अंदाज में राहुल पर तीखा हमला बोल दिया। उन्होंने राहुल की नकल उतारी और उनके “झप्पी के अनुरोध” को “उम्र के कच्चे और अनुभवहीन दौर में प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने के बेशर्मी भरे लालच” के तौर पर पेश किया।
इसके बाद उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार की बेलगाम निंदा शुरू कर दी। उन्होंने सोनिया गांधी को “अहंकारी“ कहा और फिर दशकों पुराने इतिहास में जाकर (जो एक परेशानहाल नेता का आखिरी सहारा होता है), ये दावा करने लगे कि कांग्रेस ने किस तरह सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, जेपी, चरण सिंह, चंद्रशेखर, प्रणब और पवार जैसे नेताओं को “धोखा“ दिया है।
इस तरह, मोदी ने अपना सबसे पसंदीदा और प्रभावशाली कार्ड खेल दिया। इससे उनके अन्दर यह अहसास भी देखा गया- कि  अगर वे जीत नहीं सकते, तो पोलराइजेशन यानी ध्रुवीकरण शुरू कर देगे। फर्क सिर्फ ये था कि इस बार ये ध्रुवीकरण ज्यादा बराबरी वाला था। हेडलाइंस में ये 50-50 रहा, क्योंकि राहुल गांधी ने भी बड़े साहसिक अंदाज में हमला करके गोल दाग दिया था. यानी, मैच में अब भी जान बाकी है।
गणित भी बताता है कि मैच ड्रॉ रहा
गर उन सांसदों को अलग कर देखा जाए जो अचानक सरकार के पक्ष में आ गए। (जयललिता के निधन के बाद से इन सांसदों की दरअसल कोई तय दिशा नहीं रह गई है। और वो किसी भी शिकारी के लिए आसान शिकार हो सकते हैं - इसलिए उन्हें राजनीतिक तौर पर एनडीए का हिस्सा नहीं माना जा सकता।), तो मोदी ने जिन सांसदों का समर्थन खो दिया है, उनकी संख्या 50 से कुछ ही कम है। (2014 में 336 से घटकर ये संख्या अब 290 हो गई है)। जबकि यूपीए/कांग्रेस को 65 नए सांसदों का साथ मिला है, जिससे उनकी ताकत दुगने से ज्यादा हो गई है. (2014 में 60 से बढ़कर अब 126)।
राज्यों की बात करें तो मोदी को आंध्र प्रदेश (टीडीपी) और महाराष्ट्र (शिवसेना) में एनडीए की दो सबसे पुरानी/संस्थापक पार्टियों के साथ छोड़ने का नुकसान उठाना पड़ रहा है. जबकि यूपीए/कांग्रेस को समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों समेत कई नए सहयोगी मिले हैं।
साफ है कि इस नजरिए से देखें तो यूपीए/कांग्रेस ज्यादा फायदे में है, लेकिन कुल संख्या के लिहाज से एनडीए/मोदी की जबरदस्त ताकत को देखते हुए इसे सिर्फ एक ड्रॉ ही कहा जा सकता है। 
क्या है बेलछी की घटना-
यह वाकया तब का है जब  24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई की सरकार सत्ता में आयी थी। करीब दो महीने बाद ही पटना जिले के बेलछी में 11 दलितों की हत्या कर दी गयी। सामाजिक न्याय और गरीबों के हिमायत के नाम जनता पार्टी शासन में आयी थी। उस वक्त बिहार में भी जनता पार्टी ही की सरकार थी। इस घटना की वजह से देश में जनता पार्टी की सरकार की खूब फजीहत हुई। लोग कहने लगे कि कांग्रेस और जनता पार्टी के
शासन में आखिर फर्क क्या रह गया ? इस घटना को लेकर कांग्रेस की सियासी रणनीति बनने लगी।
बेलछी नरसंहार, बिहार का पहला जातीय नरसंहार था। ये घटना हुई थी 27 मई 1977 को। इस घटना के करीब ढाई महीने बाद इंदिरा गांधी ने बिहार के बेलछी आने का फैसला किया। 13 अगस्त 1977 को इंदिरा गांधी हाथी पर सवार हो कर बेलछी पहुंची थीं। इस यात्रा से पीडित दलित परिवारों को भले कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन इंदिरा गांधी को बहुत बड़ा एक्सपोजर मिल गया। एक तस्वीर ने उन्हें देश और विदेश में चर्चा का विषय बना दिया। हाथी पर सवार इंदिरा गांधी की यह दुर्लभ तस्वीर लोगों के दिलो दिमाग में बैठ गयी।
13 अगस्त 1977 को जब इंदिरा गांधी बेलछी जाने के लिए बिहार आयीं थीं तब यहां बरसात पूरे रंग में थी। बेलछी जाने का रास्ता दुर्गम था और कई जगह बाढ़ आयी हुई थी। कच्चे रास्ते पर कीचड़ और जलजमाव था। हरनौत से बेलछी जाने का रास्ता करीब 15 किलोमीटर लंबा था जो बरसात में बेहद खराब हो चुका था। इंदिरा गांधी और दूसरे नेता हरनौत से एक जीप में आगे बढ़े। जीप थोड़ी दूर जा कर कीचड़ में फंस गयी। जीप खींचने के लिए एक ट्रैक्टर लाया गया। वह भी कीचड़ में धंस गया। इस क्रम में काफी वक्त गुजर गया। इंदिरा गांधी पैदल ही आगे बढ़ने लगीं। वो लोगों को संदेश देना चाह रहीं थी चाहे कितनी मुश्किल हो वे गरीब और दलितों की बात जरूर उठाएंगी। इंदिरा गांधी आगे-आगे और कांग्रेस के नेता पीछे- पीछे। दिन का ढलना शुरू हो गया था। आगे रास्ता और खराब था।
फिर तय हुआ कि इंदिरा गांधी को हाथी से बेलछी भेजा जाए। नारायणपुर के पास इंदिरा गांधी हाथी पर सवार हुईं। आगे महावत, बीच में इंदिरा गांधी और पीछे एक महिला। यह अद्भुत दृश्य था। इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़ कर बेलछी पहुंची। बेलछी पहुंच कर इंदिरा गांधी ने उस घटना स्थल को देखने की बात कही जहां 11 दलितों के मार कर जला दिया गया था। वहां पहुंचने पर गांव के लोगों ने कहा कि हाथी से उतर कर उन्हें मृतक के परिजनों से मिलना चाहिए।
हाथी के पास नीचे खड़ी थीं कांग्रेस की दलित नेता और राज्यसभा सदस्य सरोज खरपड़े। इंदिरा गांधी सरोज खरपड़े की तरफ देखती हैं और अंग्रेजी में कहती हैं, नहीं, नहीं अब अंधेरा होने वाला है। तभी मैले कुचैले कपड़े पहने दो औरतें रोतीं हुई हाथी के पास आती हैं और इंदिरा गांधी से मगही में कहती हैं कि दबंग जेल से ही मारने की धमकी दे रहे हैं। खतरा अब भी बना हुआ है। दलितों की बस्ती में इंदिरा गांधी की अंग्रेजी जारी रहती है। वे फिर सरोज खरपड़े से पूछती हैं- ये कौन हैं। फिर कहती हैं सरोज तुम इन सबों का नाम लिख लो, मैं आगे बढ़ती हूं, अंधेरा होने वाला है। इस दौरान इंदिरा गांधी का चेहरा पहले की तरह भावशून्य बना रहता है। हाथी कुछ आगे बढ़ा है कि दहाड़ मारती कुछ और औरते उसका रास्ता रोक लेती हैं। इंदिरा गांधी पार्टी के एक नेता से कहती हैं- इन सबों को सरोज के पास ले जाइए। हाथी फिर आगे बढ़ता है। 


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