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बदल रहा है म्युचुअल फंड





 
डेस्क। मौजूदा दौर में फंड कंपनियों की संख्या 42 तक पहुंच गई है। इस लिहाज से इनके उत्पादों और योजनाओं की तादाद भी बढ़ी है। नतीजतन फंड की पेशकश 2 हजार तक पहुंच गई है। इनमें लगभग 800 म्यूचुअल फंड प्रोडक्ट्‌स शामिल हैं। इतनी बड़ी तादाद के बाद नियामक के साथ-साथ निवेशकों को भी लग रहा था कि अलग-अलग जरूरतों के लिए म्यूच्युअल फंड स्कीम का चयन मुश्किल हो गया है।
यही वजह रही कि सेबी को लगा कि स्कीम की परिभाषा का मानकीकरण करने और इस उद्योग के लिए संचार का एकसमान मॉडल तैयार करने का समय आ गया है। इसीलिए म्यूचुअल फंड के उत्पादों की स्थिति निर्धारण और निवेश शैली के मुताबिक उन्हें श्रेणीबद्ध किया गया।
यह सब कब शुरू हुआ?
वर्ष 2015 में बाजार नियामक सेबी के पूर्व अध्यक्ष की मदद से म्यूचुअल फंड उद्योग की प्रतिनिधि संस्था एम्फी ने वित्त मंत्रालय को एक प्रस्तुति दी और यह मानने का अनुरोध किया कि म्यूचुअल फंड की समेकन योजना की प्रक्रिया में होने वाली यूनिट के किसी भी स्थानांतरण को स्थानांतरण न माना जाए, ताकि यूनिट धारकों को अल्पावधि या लंबे समय में पूंजीगत लाभ का नुकसान न हो।
मोटे तौर पर इस कदम का मकसद इसे निवेशकों के लिए जयादा टैक्स प्रभावी बनाना था, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य मौजूदा योजनाओं के एकीकरण को प्रोत्साहित करना था। निवेशकों और उद्योग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, मंत्रालय ने उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी। इसके बाद, सेबी (म्यूचुअल फंड) विनियम, 1996 के अनुसार म्यूचुअल फंड से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के एकीकरण की प्रक्रिया के तहत यूनिट्‌स के हस्तांतरण को लेकर तटस्थता के लिए 'वित्त अधिनियम, 2015' धारा 47 के तहत एक खास प्रावधान किया गया।
नवेशकों को फायदा, लेकिन उद्देश्य अधूरा
इस संशोधन से निवेशकों को फायदा हुआ, लेकिन म्यूचुअल फंड स्कीम्स की बढ़ती संख्या कम करने का प्रमुख उद्देश्य हासिल नहीं हो पाया। निवेशकों के बीचभी नए फंडों की पेशकश की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति थी। लेकिन, निरंतर निवेशक शिक्षा कार्यक्रमों और निवेश की बेहतर समझ की बदौलत कुछ समय के बाद उनके बर्ताव में बदलाव आया।
निवेशकों ने प्रस्तुत की जाने वाली एनएवी (नेट एसेट वैल्यू) के बावजूद मौजूदा योजनाओं को स्वीकार करना शुरू कर दिया और मौजूदा ओपन एंडेड फंड में पैसा आना शुरू हो गया। इसलिए निवेशकों और वितरकों के नजरिए से किसी नए फंड को बाजार में उतारने की जरूरत भी कम हो गई। स्वीकृति में हुई यह बढ़ोतरी एकीकरण की मौजूदा कवायद के साथ अच्छी तरह से मेल खाती है, जिसका लक्ष्य स्पष्टता लाना और मानक परिभाषा तैयार करना है।
सेबी ने अब इक्विटी फंड की 10 श्रेणियों, डेट फंड की 16 श्रेणियों, मिश्रित फंड की 6 श्रेणियों, समाधान-आधारित फंड की 2 श्रेणियों और इंडेक्स फंड/एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) व 'फंड ऑफ फंड्‌स' (एफओएफ) में से हरेक के लिए 1 श्रेणी परिभाषित की है। इस तरह कुल 36 श्रेणियां हैं। यह थोड़ा जटिल लग सकता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इनसे सहूलियत होगी।
म्यूच्युअल फंड उद्योग के लिए इसमें क्या है?
यह अभ्यास तब हो रहा है, जब म्यूचुअल फंड उद्योग विकास के एक बड़े केंद्र में है। इस उद्योग के लिए विकास का अगला दौर हमारे वर्तमान समय के क्रियाकलापों पर आधारित होगा। आगे चलकर फंड प्रबंधकों को निर्धारित परिधि के भीतर रहकर काम करना होगा, जो मौजूदा चलन के मुकाबले थोड़ा मुश्किल होगा। यह प्रतिभूतियों की पहचान में दिशानिर्देशों के एक समूह का पालन करने के लिए स्पष्टता और उनके लिए एक हद तक सहजता भी प्रदान करता है।
हालांकि यह पोर्टफोलियो प्रबंधन के तरीकों को प्रतिस्थापित कर रहा है और न केवल मार्केट कैप निवेश के आधार पर फायदा पहुंचाता है, बल्कि सही क्षेत्र और स्टॉक का चयन करने के लिए भी स्टॉक चयन में अंतर और व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर पूरी तरह से उन्हें तैयार करता है। स्पष्ट अनिवार्यता और मानकों के साथ संचालन न केवल पूर्वानुमान की सटीक भविष्यवाणी की संभावना बढ़ाएगा, बल्कि जोखिम भी कम करेगा।
इसमें निवेशकों के लिए क्या है
पुनर्वितरण प्रक्रिया में निवेशकों पर प्रमुखता से ध्यान दिया गया है, ताकि फंडों के चयन और निवेश की प्रक्रिया सरल बनाई जा सके। निवेशक अब उन स्कीम्स या उत्पादों को आसानी से समझ सकते हैं, जो उनके निवेश लक्ष्य, शैली और निवेश की अवधि के अनुरूप हैं। स्पष्ट परिभाषा, अवधि वर्ग (एक निश्चित आयपोर्टफोलियो की औसत परिपक्वता) और सही टैगलाइन के साथ निवेशकों को जानकारीपूर्ण विकल्प चुनने का अधिकार दिया गया है।
जब इस वर्गीकरण की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तब निवेशकों के लिए इस पूरे उद्योग में फंडों की तुलना भी आसान हो जाएगी। वितरक ग्राहक को सही उत्पादों का चयन करने के मामले में मदद कर सकते हैं और उन्हें फंड का उद्देश्य स्पष्ट रूप से समझा सकते हैं। घरेलू म्यूचुअल फंड उद्योग और सेबी का यह प्रयास पक्के तौर पर अनूठा अभ्यास है, जो दुनिया में अपनी तरह का पहला कदम है।
कुल मिलाकर इस मामले में भारतीय नियामक समय से आगे है और हमेशा भारतीय पूंजी बाजार को व्यवस्थित करने और कई क्षेत्रों में निवेशकों के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करने में सक्रिय रहा है। जिस तरह इस बारे में सोचा गया है और इसे अंजाम दिया गया है, उसके लिए सेबी के साथ-साथ यह पूरा उद्योग भी प्रशंसा का हकदार है।
हर प्रोडक्ट हर निवेशक के लिए मुफीद नहीं होता
दरअसल, दुनिया के किसी भी कोने में हर निवेशक की जरूरतें एक जैसी नहीं होती हैं। जाहिर है कि निवेश के मामले में भी यह चीज लागू होती है। आय, जीवनशैली, परिवार का आकार, भविष्य की जरूरतें, उम्र और माली हालत के हिसाब से निवेश का तरीका अलग-अलग होना चाहिए। कुछ मामलों में लोगों की अपनी प्राथमिकताएं भी होती हैं। मसलन, कई लोग खुद के घर की जगह किराए के मकान में रहना पसंद करते हैं और जीवनशैली पर ज्यादा जोर देते हैं।
कुछ लोगों के लिए शिक्षा और पर्यटन ज्यादा मायने रखते हैं। ऐसे में सभी लोग एक ही तरह के प्रोडक्ट में निवेश नहीं कर सकते। फिर उनके लिए म्यूचुअल फंड अलग-अलग क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसा नहीं है कि अब तक अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग फंड नहीं थे। दिक्कत तो केवल यह थी कि उन्हें वर्गीकृत नहीं किया गया था, इसलिए अपने लिए सही फंड का चयन आसान नहीं ता। सेबी ने इस मोर्चे पर काम करने की कोशिश की है।

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