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न्याय की दृष्टि से हर व्यक्ति का प्राकृतिक संसाधनों पर समान रूप से जन्मसिद्ध अधिकार होता है


रोशन लाल अग्रवाल की कलम से -
समाज में शांति की स्थापना के लिए न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करने के लिए न्यायपूर्ण संपत्ति अधिकार आवश्यक है ताकि हर व्यक्ति अपने उपभोग की सभी वस्तुओं को सहज रुप से प्राप्त कर सके सारी प्राकृतिक संसाधन की संपत्ति होते हैं। सारी प्राकृतिक संसाधन संपत्ति होते हैं और हर व्यक्ति अपने वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इनकी अधिक से अधिक मात्रा पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता है लेकिन यह प्राकृतिक संसाधन प्रकृति में हमेशा सीमित मात्रा में भी उपलब्ध रहते हैं इसलिए व्यवहारिक दृष्टि से कोई भी व्यक्ति इनकी सीमाहीन मात्रा का संग्रह नहीं कर सकता। क्योंकि इससे प्राकृतिक संसाधनों की कृत्रिम कमी हो जाती है और एक व्यक्ति द्वारा किया गया हिं का भारी संग्रह गीत अनेक लोगों के लिए अभाव का कारण बन जाता है जिससे लोगों में परस्पर विवाद टकराव युद्ध और विनाश की स्थिति बनती है। इसलिए यदि हम समाज में शांति चाहते हैं तो हमें सबसे पहले एक व्यक्ति के न्यायपूर्ण संपत्ति अधिकार को परिभाषित करना पड़ेगा ताकि कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक संसाधनों पर अपने मूल अधिकार की सीमा का अतिक्रमण न कर सके। न्याय की दृष्टि से हर व्यक्ति का प्राकृतिक संसाधनों पर समान रूप से जन्म सिद्ध अधिकार होता है क्योंकि मनुष्य ने इनको नहीं बनाया है और हम केवल तीन के रूपांतरण के द्वारा अपने को निरंतर पूरा करते रहते हैं। यह प्राकृतिक संसाधन निरंतर एक दूसरे में रूपांतरित ही होते रहते हैं और कृत्रिम रूप से इन का रूपांतरण भी किया जा सकता है इसलिए कभी भी इन का अभाव नहीं होता। हर व्यक्ति को अपने उपभोग के लिए प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग को पूरा करना अत्यंत अनिवार्य है क्योंकि इसके बिना कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता लेकिन हर व्यक्ति की यह जरूरत सीमित साधनों से ही पूरी हो जाती है इसलिए सीमाहीन संपत्ति का संग्रह अनावश्यक और अनुचित है। यह मनुष्य की लोभ लालच में प्रवृत्ति का परिणाम है। लोभ लालच और स्वार्थ की यह प्रवृत्ति हर व्यक्ति में जन्म से ही होती है नहीं रही लोगों में युद्ध और टकराव का कारण बनती है। इसलिए इस पर इसलिए इस पर अंकुश रखा जाना हद जरूरी है। संपत्ति की मात्रा पर यह अंकुश केवल अमीरी रेखा ही हो सकता है और न्याय के आधार पर यह मात्रा सभी व्यक्तियों के लिए समान होनी चाहिए जो व्यावहारिक दृष्टि से केवल औसत सीमा ही हो सकती है। इसलिए हर व्यक्ति को केवल औसत सीमा तक संपत्ति संग्रह करने का मूल अधिकार प्राप्त होना चाहिए जो जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे प्राप्त होता रहे। इसलिए औसत सीमा से अधिक संपत्ति के लिए व्यक्ति को समाज का सरदार माना जाना चाहिए और अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से संपत्ति कर लगाया जाना चाहिए इसका अर्थ यह हुआ कि कोई भी व्यक्ति जितनी चाहे उतनी संपत्ति तो रख सकता है लेकिन औसत सीमा से अधिक संपत्ति के लिए वह समाज का कर्जदार होता है और उसे समाज को ब्याज की दर से संपत्ति कर देना होगा। संपत्ति कर से होने वाली है आज समाज के सामूहिक आय होगी और इसका उपयोग समाज के सामूहिक खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार ब्याज से होने वाली गाय सामूहिक शब्दों से काफी ज्यादा होगी और शेष बची राशि का उपयोग सभी नागरिकों को लाभांश के रुप में बांट दिया जाना चाहिए इतनी भारी मात्रा में धनराशि मिलती रहेगी जिससे हर व्यक्ति अपने उपभोग के अभाव को आसानी से पूरा कर सकें।  इस प्रकार के धन के वितरण से समाज में हर व्यक्ति को निरंतर न्याय पूर्वक अपने उपभोग की सभी वस्तुएं बिना किसी परेशानी के मिलती रहेंगी और कोई भी व्यक्ति व्यवस्था से दुखी या असंतुष्ट नहीं हो सकता और सभी लोग सुख शांति सुरक्षा और संतुष्टि के साथ अपना जीवन जी सकेंगे।

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