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सौहार्द का इतिहास भी संजोये हुए है गंगा मेला

कानपुर।   होली से गंगा मेला तक सप्ताह भर की होली से आजादी की एक घटना ही नहीं जुड़ी बल्कि सौहार्द का इतिहास भी संजोये हुए है। भले ही इस परंपरा से हटिया में होरियारों की गिरफ्तारी और आंदोलन के बाद उन्हें छोड़ने की जीत की कहनी जुड़ी है लेकिन यह परंपरा उससे बहुत पहले से मौजूद थी और अब भी ¨हदू मुस्लिम सौहार्द की कहानी कहती है। जब कानपुर नहीं था तब यह क्षेत्र जाजमऊ में परगना में आता था, तब रंग पंचमी तक होली मनाए जाने का जिक्र एतिहासिक किताबों में मिलता है। यहां की मुख्य होली तो रंग पंचमी को होती थी। इसका कारण बताया जाता है कि उस समय से काफी पहले यहां के एक राजा के साथ होली के दिन कुछ मुस्लिम जमींदारों से जंग हो गई और पांच दिन बाद रंग पंचमी के दिन जीत के बाद होली मनाई गई। यह परंपरा, जाजमऊ शनिगंवा आदि क्षेत्रों में आज भी जिंदा है।
क्षेत्रों के अनुसार थे होली के दिन
कानपुर पर लिखी गई इतिहास की पहली किताब मानी जाने वाली दरगारी लाल की किताब तवारीख-ए-कानपुर, विद्वान व लेख सद्गुरु शरण अवस्थी की किताब मार्ग के गहरे चिह्न व कई शोध किताबों में कानपुर में विविध दिनों को होली मनाये जाने का जिक्र है। दरगाही लाल की किताब तवारीख ए कानपुर, जिसका प्रकाशन 1875 में हुआ था। इस किताब के अनुसार आर्य नगर व स्वरूप नगर क्षेत्र में होली प्रतिपदा के दिन मनाई जाती थी। जाजमऊ स्थित शासन व्यवस्था के दूसरे छोर पर स्थित उजियारी पुरवा खैरा आदि क्षेत्र में होली के दूसरे दिन यानी भाई दूज को मनाई जाती थी। जबकि किदवई नगर के क्षेत्र में होली प्रतिपदा और दूज को मनाई जाती थी। कानपुर के इतिहास पर कई किताबें लिखने वाले मनोज कपूर कहते हैं कि कानपुर में कई दिनों की होली मनाने की परंपरा आजादी की जंग से पुरानी है।
स्वांग में गूजता था हिदू-मुस्लिम प्रेम
मनोज कपूर कहते हैं इस दौरान समाजिक सौहार्द भी खूब देखने को मिलता था। उजियारी पुरवा मूल रूप से मल्लाहों का क्षेत्र है। यहां और जाजमऊ क्षेत्र में पांच दिनों तक स्वांग का आयोजन होता था। इसमें मुस्लिम समाज बढ़कर भागीदारी करता था। लेखक सदगुरु सरण अवस्थी 1975 में आई अपनी किताब मार्ग के गहरे चिह्न में लिखते हैं कि 1922 तक कानपुर के राजनैतिक के साथ समाजिक सरोकारों में ¨हदू-मस्लिम के सबंध प्रगाढ़ थे। त्योहारों पर यह खूब देखने को मिलता था। होली पर रात भर स्वांग का आयोजन होता था, जिसमें मुस्लिम समाज बहुतायत में होता था। सायं से रात तीन बजे तक 40-50 मुस्लिम अखाड़ों की चौकियां निकलती थी। इसमें मुसलमानों के घोसी समुदाय का प्रतिभाग करीब 90 फीसद होता था। दरगाही लाल की किताब तवारीख ए कानपुर के अनुसार स्वांग में ¨हदुओं से ज्यादा मुस्लिम समुदाय भाग लेता था।
होली में आई थी बुराइयां
मनोज कपूर कहते हैं इस परंपरा में बुराइयां भी आने लगी थीं। जश्न का स्थान नशेबाजी और गानों का स्थान अश्लीलता लेने लगा था। परंपरा में बढ़ी अश्लीलता और नशा सभ्य समाज को अखरने लगा था।
विद्यार्थी जी आए आगे
मनोज कपूर के अनुसार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने इसपर 1925 के आसपास अपने प्रताप प्रेस में एक लेख भी छापा था। वह बुद्धिजीवियों को लेकर समाज में आए। आर्य समाजी और सनातन धर्मी दोनों ¨हदू समुदायों ने एक साथ मुहिम चलाई। मार्ग के गहरे चिह्न में भी इस आंदोलन की बात कही गई है। इसके अनुसार समाज में इस आंदोलन का अच्छा असर हुआ।

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